उत्तराखंड में स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे जेन-जी डॉक्टरउत्तराखंड में स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे जेन-जी डॉक्टर

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देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े करीब 1200 जेन-जी डॉक्टरों के आंदोलन ने अब बड़ा रूप ले लिया है। स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर पीजी डॉक्टरों और एमबीबीएस इंटर्न के बीच असंतोष बढ़ रहा है। डॉक्टर संगठनों की ओर से 7 सितंबर 2026 से हड़ताल पर जाने की तैयारी की जानकारी सामने आई है। इस आंदोलन में करीब 600 पीजी डॉक्टर और 600 एमबीबीएस इंटर्न शामिल होने की बात कही जा रही है। मामला मुख्य रूप से डॉक्टरों के वर्तमान स्टाइपेंड, काम के दबाव और दूसरे राज्यों की तुलना में मिलने वाले मानदेय से जुड़ा है। डॉक्टरों का कहना है कि उनकी जिम्मेदारियों और ड्यूटी के मुकाबले वर्तमान स्टाइपेंड पर्याप्त नहीं है। वहीं, इंटर्न डॉक्टरों ने भी अपने मासिक स्टाइपेंड में बढ़ोतरी की मांग उठाई है। ऐसे में आंदोलन का अगला चरण स्वास्थ्य सेवाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन

रिपोर्टों के अनुसार उत्तराखंड के पीजी डॉक्टर स्टाइपेंड बढ़ाकर करीब 1.10 लाख रुपये प्रतिमाह किए जाने की मांग कर रहे हैं। वर्तमान में अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में पीजी डॉक्टरों को करीब 69 से 73 हजार रुपये का ग्रॉस स्टाइपेंड मिलने की बात सामने आई है। डॉक्टरों के अनुसार कटौती के बाद वास्तविक भुगतान इससे कम रह जाता है। दूसरी ओर एमबीबीएस इंटर्न डॉक्टरों की मांग है कि उनका मासिक स्टाइपेंड मौजूदा करीब 17 हजार रुपये से बढ़ाकर कम से कम 30 हजार रुपये किया जाए। इंटर्न डॉक्टरों ने महंगाई, आवास, भोजन, आने-जाने और पढ़ाई से जुड़े खर्चों का हवाला देते हुए इसे बढ़ाने की मांग की है। डॉक्टरों का कहना है कि मेडिकल कॉलेजों में प्रशिक्षण के साथ-साथ उन्हें ओपीडी, आईपीडी और आकस्मिक सेवाओं में भी जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। पीजी डॉक्टरों ने कई बार लंबी ड्यूटी और काम के दबाव का मुद्दा उठाया है।

इस आंदोलन को लेकर ‘उत्तराखंड रेजीडेंट डॉक्टर्स यूनाइटेड’ और ‘वॉयस ऑफ इंटर्न्स-उत्तराखंड’ जैसे समूहों की गतिविधियां सामने आई हैं। पहले सोशल मीडिया के माध्यम से डॉक्टरों ने अपनी मांगों को सरकार और संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने का प्रयास किया। इसके बाद ज्ञापन और मुलाकातों का दौर शुरू हुआ। दून मेडिकल कॉलेज के रेजीडेंट डॉक्टरों के प्रतिनिधिमंडल ने भी कॉलेज प्रशासन के अधिकारियों से मुलाकात कर अपनी मांग रखी। रिपोर्ट के अनुसार डॉक्टरों ने स्टाइपेंड में संशोधन की मांग को लेकर आगे आंदोलन करने की चेतावनी दी है।

डॉक्टरों की ओर से यह मुद्दा स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सा शिक्षा से जुड़े अधिकारियों के सामने पहले भी रखा गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक पीजी डॉक्टरों ने स्वास्थ्य मंत्री और चिकित्सा शिक्षा निदेशक से मुलाकात की थी। वहीं, मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्यों से भी स्टाइपेंड वृद्धि से संबंधित प्रस्ताव मांगे जाने की जानकारी सामने आई थी। इससे संकेत मिलता है कि स्टाइपेंड बढ़ाने का विषय शासन स्तर तक पहुंच चुका है। हालांकि डॉक्टरों की ओर से तत्काल समाधान की मांग की जा रही है।

आंदोलन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष एमबीबीएस इंटर्न डॉक्टरों से जुड़ा है। हल्द्वानी और अन्य मेडिकल कॉलेजों के इंटर्न डॉक्टरों ने अपने स्टाइपेंड में बढ़ोतरी की मांग की है। उनकी ओर से कहा गया है कि मेडिकल कॉलेजों में प्रशिक्षण के दौरान काम की जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, जबकि मौजूदा स्टाइपेंड में रोजमर्रा के खर्च पूरे करना मुश्किल हो रहा है। इंटर्न डॉक्टरों ने इस मुद्दे को ज्ञापन और शांतिपूर्ण विरोध के माध्यम से उठाया है। कुछ स्थानों पर डॉक्टरों द्वारा काली पट्टी बांधकर विरोध जताने की भी रिपोर्ट सामने आई है।

डॉक्टरों के आंदोलन में एक प्रमुख तर्क दूसरे राज्यों में मिलने वाला स्टाइपेंड भी है। डॉक्टरों का दावा है कि उत्तराखंड की तुलना में कई अन्य राज्यों में पीजी डॉक्टरों और इंटर्न को अधिक मानदेय दिया जा रहा है। इसी आधार पर वे राज्य में स्टाइपेंड की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। हालांकि अलग-अलग राज्यों में स्टाइपेंड की राशि, मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था और अन्य सेवा शर्तें अलग हो सकती हैं। इसलिए अंतिम तुलना संबंधित सरकारी नियमों और आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर ही स्पष्ट होगी।

यदि डॉक्टरों की प्रस्तावित हड़ताल 7 सितंबर से शुरू होती है तो इसका सबसे सीधा असर सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों की नियमित सेवाओं पर पड़ सकता है। पीजी डॉक्टर और इंटर्न अस्पतालों की चिकित्सा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में ओपीडी, वार्ड, जांच और अन्य सेवाओं के संचालन को लेकर अस्पताल प्रशासन को वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ सकती है। हालांकि हड़ताल के दौरान कौन-कौन सी सेवाएं प्रभावित होंगी और आपातकालीन सेवाओं के संचालन की क्या व्यवस्था रहेगी, यह संबंधित मेडिकल कॉलेज प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के निर्देशों पर निर्भर करेगा। इसलिए मरीजों को किसी भी तरह की परेशानी की स्थिति में संबंधित अस्पताल से आधिकारिक जानकारी लेना बेहतर होगा।

सरकार और डॉक्टरों के बीच बातचीत से निकल सकता है समाधान

पूरे विवाद का केंद्र स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग है। डॉक्टरों की ओर से लंबे समय से मांग उठाई जा रही है, जबकि शासन स्तर पर प्रस्ताव और समीक्षा की प्रक्रिया की जानकारी सामने आई है। ऐसे में यदि सरकार और डॉक्टर प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के जरिए स्टाइपेंड पर सहमति बनती है तो हड़ताल टलने की संभावना बन सकती है। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में 7 सितंबर से प्रस्तावित हड़ताल को लेकर डॉक्टरों की तैयारी की बात सामने आई है। दूसरी ओर उत्तराखंड के चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग की ओर से इस मुद्दे पर आगे क्या निर्णय लिया जाता है, इस पर नजर रहेगी।

डॉक्टरों के आंदोलन की स्थिति में मरीजों को सोशल मीडिया पर प्रसारित अपुष्ट सूचनाओं पर भरोसा करने के बजाय संबंधित मेडिकल कॉलेज या अस्पताल की आधिकारिक सूचना देखनी चाहिए। आपात स्थिति में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पताल प्रशासन द्वारा जारी निर्देशों का पालन करना अधिक उचित होगा।

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By ATHAR

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