उत्तराखंड में बिजली दर बढ़ोतरी के 5900 करोड़ रुपये के प्रस्ताव पर विद्युत नियामक आयोग में सुनवाईउत्तराखंड में ऊर्जा निगम के 5900 करोड़ रुपये के प्रस्ताव पर विद्युत नियामक आयोग में सुनवाई हुई। जानिए प्रस्ताव से बिजली दर और उपभोक्ताओं पर संभावित असर क्या हो सकता है।

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रिपोर्टर (सचिन शर्मा)

देहरादून/हरिद्वार। उत्तराखंड में बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाले समय में बिजली की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ सकती है। ऊर्जा निगम की ओर से उपभोक्ताओं पर करीब 5,900 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार डालने का प्रस्ताव विद्युत नियामक आयोग के समक्ष रखा गया है। यदि यह प्रस्ताव स्वीकार होता है और इस राशि की वसूली बिजली दरों के माध्यम से की जाती है, तो उपभोक्ताओं को आने वाले समय में अधिक बिजली बिल का सामना करना पड़ सकता है। प्रस्ताव को लेकर बुधवार को विद्युत नियामक आयोग में सुनवाई हुई। इस सुनवाई में उपभोक्ताओं की ओर से विरोध दर्ज कराने के लिए अपेक्षाकृत कम लोग पहुंचे। हालांकि, इंडस्ट्री एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड की ओर से प्रतिनिधि राजीव अग्रवाल अपने एक सहयोगी के साथ सुनवाई में शामिल हुए और उन्होंने प्रस्ताव को लेकर उपभोक्ता हित से जुड़े कई सवाल उठाए।

मामले में सामने आए आकलन के मुताबिक, यदि करीब 5,900 करोड़ रुपये की पूरी राशि की वसूली बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी के माध्यम से की जाती है तो कुछ अवधि के लिए बिजली की दर में प्रति यूनिट करीब तीन रुपये तक की वृद्धि की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, यह एक आकलन है और वास्तविक दर कितनी बढ़ेगी, यह नियामक आयोग के निर्णय और निर्धारित प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। ऊर्जा निगम की ओर से उपभोक्ताओं पर करीब 5,900 करोड़ रुपये का भार डालने का प्रस्ताव विद्युत नियामक आयोग के समक्ष रखा गया है। इस प्रस्ताव को लेकर मुख्य सवाल यह है कि प्रस्तावित राशि की वसूली किस तरीके से की जाएगी और इसका सीधा प्रभाव बिजली उपभोक्ताओं पर कितना पड़ेगा।

यदि नियामक आयोग प्रस्ताव को मंजूरी देता है और राशि की रिकवरी बिजली टैरिफ के माध्यम से करने का निर्णय लिया जाता है, तो उपभोक्ताओं के बिजली बिल बढ़ सकते हैं। इसी वजह से इस मामले को लेकर उपभोक्ता हित से जुड़े सवाल उठ रहे हैं। मामले में बिजली की संभावित दर को लेकर जो आंकड़ा सामने आया है, उसमें कुछ समय के लिए प्रति यूनिट करीब तीन रुपये तक की संभावित वृद्धि का आकलन किया गया है। हालांकि इसे अंतिम बिजली दर नहीं माना जा सकता। अंतिम निर्णय विद्युत नियामक आयोग की ओर से प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।

सुनवाई में जनता की ओर से लोगों के न आने से आयोग अध्यक्ष एमएल प्रसाद भी हैरान थे। उन्होंने बताया कि सुनवाई में आपत्ति दर्ज कराने को पूरा समय दिया गया था। सूचना प्रकाशित र कराने से लेकर वेबसाइट पर भी सूचना दी गई थी। सुनवाई में इंडस्ट्री एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के प्रतिनिधि राजीव अग्रवाल अपने एक सहयोगी के साथ पहुंचे। उन्होंने प्रस्ताव को लेकर उपभोक्ताओं के हितों से जुड़े सवाल उठाए और कहा कि करीब 25 साल बाद जनता पर इस तरह का अतिरिक्त भार क्यों डाला जाए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जिस संपत्ति ट्रांसफर की बात की जा रही है, उसकी वास्तविक स्थिति की धरातलीय जांच का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। उनका कहना था कि पूरे मामले में उपभोक्ता हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

सुनवाई के दौरान राजीव अग्रवाल ने प्रस्तावित अतिरिक्त भार को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। उनका तर्क था कि किसी भी ऐसे वित्तीय भार का प्रभाव अंततः बिजली उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है, इसलिए प्रस्ताव की बारीकी से जांच आवश्यक है। उन्होंने संपत्ति ट्रांसफर से जुड़े पहलू पर भी सवाल उठाया। उनके अनुसार जिस संपत्ति को लेकर प्रक्रिया की बात की जा रही है, उसकी वास्तविक स्थिति का धरातल पर सत्यापन किया गया है या नहीं, इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। एसोसिएशन की ओर से यह भी कहा गया कि उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए किसी भी वित्तीय दायित्व को बिजली दरों में शामिल करने से पहले सभी तथ्यों की जांच की जानी चाहिए।

बिजली उपभोक्ताओं पर क्या हो सकता है असर?

इस प्रस्ताव को लेकर सबसे बड़ा सवाल बिजली उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले संभावित वित्तीय प्रभाव का है। यदि 5,900 करोड़ रुपये की रिकवरी बिजली टैरिफ के माध्यम से की जाती है, तो इसका असर घरेलू, वाणिज्यिक और अन्य श्रेणी के उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि बिजली की दर वास्तव में कितनी बढ़ेगी। प्रति यूनिट तीन रुपये तक बढ़ोतरी का आंकड़ा फिलहाल आकलन के तौर पर सामने आया है। वास्तविक बढ़ोतरी की स्थिति आयोग के अंतिम निर्णय, वसूली की अवधि और अपनाए जाने वाले टैरिफ मॉडल पर निर्भर करेगी।

इसलिए उपभोक्ताओं को फिलहाल किसी निश्चित दर वृद्धि को अंतिम मानकर चलने के बजाय विद्युत नियामक आयोग के निर्णय का इंतजार करना होगा। अब इस मामले में आगे की प्रक्रिया और विद्युत नियामक आयोग के निर्णय पर सभी की नजर रहेगी। यदि प्रस्ताव को किसी रूप में मंजूरी मिलती है तो उसके बाद यह स्पष्ट होगा कि उपभोक्ताओं पर कितना भार डाला जाएगा और उसकी वसूली किस अवधि में किस तरीके से की जाएगी।

फिलहाल 5,900 करोड़ रुपये का प्रस्ताव और इससे बिजली दरों में संभावित बढ़ोतरी का अनुमान चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। वहीं सुनवाई में उपभोक्ताओं की ओर से सीमित भागीदारी ने भी सवाल खड़े किए हैं। बिजली दरों में किसी भी संभावित बदलाव का सीधा असर प्रदेश के लाखों उपभोक्ताओं के मासिक बजट पर पड़ सकता है। ऐसे में उपभोक्ता संगठनों और आम बिजली उपभोक्ताओं की ओर से इस मामले में आगे होने वाली सुनवाई और आयोग के अंतिम निर्णय पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

यूपी से अलग होने के समय 550 करोड़ की संपत्ति बिजली योजनाओं के रूप में उत्तराखंड को मिली। यह 550 करोड़ एसेट के रूप में ऊर्जा निगम को बिजली दरों में मिलने थे, जो आज तक नहीं मिले। इस बीच साल-दर-साल इस 550 करोड़ की संपत्ति के रखरखाव पर होने वाले खर्च जुड़ते हुए यह रकम अब 5900 करोड़ तक पहुंच गई है। वित्त विभाग इस रकम को ऊर्जा निगम से मिलने वाले पैसे के साथ बुक एडजस्टमेंट करने को तैयार नहीं है। ऐसे में ऊर्जा निगम ने इसे जनता से वसूलने की मांग की है।

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By ATHAR

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