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रिपोर्टर (फ़रमान खान)
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव है। बदलती जलवायु, सीमित संसाधन और पारंपरिक खेती की चुनौतियों के बीच किसानों को आधुनिक तकनीकों से जोड़ना समय की आवश्यकता बन गया है। इसी उद्देश्य से लक्सर विकासखंड सभागार में आयोजित उत्तराखंड किसान गोष्ठी किसानों के लिए ज्ञान और नवाचार का सशक्त मंच साबित हुई।
जिला कृषि अधिकारी गोपाल सिंह भण्डारी के नेतृत्व में आयोजित इस कार्यक्रम में उपजिलाधिकारी सौरव असवाल और ब्लॉक प्रमुख हर्ष कुमार दौलत की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष महत्व दिया। सैकड़ों किसानों की भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि लक्सर क्षेत्र में कृषि नवाचार को लेकर उत्साह बढ़ रहा है।
आधुनिक कृषि की ओर बढ़ता कदम
कार्यक्रम का शुभारंभ कृषि विभाग के ध्वज फहराने के साथ हुआ। मुख्य अतिथि गोपाल सिंह भण्डारी ने कहा,
“कृषि विभाग का मिशन है हर किसान को आधुनिक कृषि के द्वार तक पहुंचाना। आज की यह गोष्ठी फसल चक्र सुधार और पशुधन को स्वस्थ रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।”
उन्होंने बताया कि ‘प्राकृतिक खेती अभियान’ और ‘पशु बीमा योजना’ जैसी योजनाएं किसानों की आय बढ़ाने में सहायक होंगी। साथ ही ड्रिप इरिगेशन और जैविक उर्वरकों के उपयोग को जल संकट वाले क्षेत्रों के लिए प्रभावी समाधान बताया।
सरकारी योजनाओं का लाभ लेने पर जोर
उपजिलाधिकारी सौरव असवाल ने किसानों को जागरूकता की अहमियत समझाते हुए कहा,
सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ तभी मिलेगा जब किसान सक्रिय रूप से जानकारी प्राप्त करें और तकनीकों को अपनाएं।”
ब्लॉक प्रमुख हर्ष कुमार दौलत ने भी कृषि विभाग के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि विशेषज्ञों की सलाह से पशु नस्ल सुधार और फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा, जिससे किसानों की आर्थिक स्वतंत्रता मजबूत होगी।
गोष्ठी में वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिकों और पशुधन विशेषज्ञों ने विस्तृत सत्रों के माध्यम से किसानों को व्यावहारिक जानकारी दी।
फसल प्रबंधन पर मुख्य बिंदु:
- धान और गेहूं के साथ मंडुआ और ज्वार जैसी पौष्टिक फसलों को अपनाने की सलाह।
- एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) से रासायनिक दवाओं के खर्च में 50% तक कमी संभव।
- मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरक उपयोग की रणनीति।
पशुधन प्रबंधन पर सुझाव:
- पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अनुकूलित संकर नस्लों से दूध उत्पादन में 40% तक वृद्धि।
- नियमित टीकाकरण और संतुलित आहार।
- साइलेज चारे के उपयोग से पशुओं का बेहतर स्वास्थ्य।
- कृषि विभाग ने मौके पर ही किसानों को मुफ्त मिट्टी परीक्षण किट, उन्नत बीज पैकेट और पशु स्वास्थ्य कार्ड वितरित किए।
लक्सर के किसानों ने इस पहल को “कृषि क्रांति का प्रारंभिक कदम” बताया। युवा किसान प्रतिनिधि सनम अहमद ने कहा,
“जैविक खेती के टिप्स से हम पर्यावरण संरक्षण के साथ बेहतर लाभ कमा सकेंगे। विभाग का मार्गदर्शन हमारे लिए अमूल्य है।”
कई किसानों ने बताया कि अब वे अपनी फसलों को कीटों से बेहतर तरीके से बचा पाएंगे और पशुओं के पोषण में सुधार कर सकेंगे।
यह गोष्ठी कृषि विभाग के ‘किसान संपर्क अभियान’ के अंतर्गत आयोजित की गई। विभाग ने आश्वासन दिया कि आने वाले समय में और भी कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी, जिनमें किसानों को डिजिटल कृषि ऐप्स, बाजार से सीधे जुड़ने की रणनीति और मूल्य संवर्धन की जानकारी दी जाएगी। इस पहल का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि सतत कृषि विकास को बढ़ावा देना भी है, ताकि उत्तराखंड के किसानों को स्थायी आय के अवसर मिल सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आधुनिक तकनीकों को पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़ा जाए, तो उत्तराखंड कृषि के क्षेत्र में नई पहचान बना सकता है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखते हुए ड्रिप इरिगेशन, जैविक खेती और फसल विविधीकरण जैसे कदम भविष्य के लिए अनिवार्य हो गए हैं। कृषि विभाग की यह पहल लक्सर से शुरू होकर पूरे राज्य में विस्तार पाएगी। इससे न केवल किसानों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
लक्सर में आयोजित उत्तराखंड किसान गोष्ठी ने यह साबित कर दिया कि यदि प्रशासन, कृषि विशेषज्ञ और किसान मिलकर काम करें तो कृषि क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव संभव है। आधुनिक तकनीकों के प्रयोग, सरकारी योजनाओं का लाभ और जागरूकता—इन तीनों के समन्वय से राज्य में हरित क्रांति की नई शुरुआत हो सकती है। कृषि विभाग का संदेश स्पष्ट है—
“किसान सशक्त होंगे, तभी उत्तराखंड समृद्ध होगा।”
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