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लक्सर से संवाददाता गुरप्रीत सिंह
उत्तराखंड में मखाना खेती का नया प्रयोग: जलभराव वाली जमीन बनी ‘सोने की फसल’, महिला उद्यमियों की पहल से खुलीं नई राहें

उत्तराखंड में कृषि क्षेत्र में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां पारंपरिक खेती सीमित होती जा रही थी, वहीं अब नवाचार और नई तकनीकों के जरिए किसानों के लिए आय के नए रास्ते खुल रहे हैं। इसी कड़ी में “वर्णम” (Varnam) स्टार्टअप द्वारा मखाना (Fox Nut) की खेती का अभिनव प्रयोग किया गया है, जिसने कृषि और महिला सशक्तिकरण दोनों क्षेत्रों में नई उम्मीद जगाई है।
जलभराव वाली जमीन को बनाया अवसर
लक्सर क्षेत्र के गंदासपुर गांव में जिस जमीन पर यह परियोजना शुरू की गई है, वह वर्ष में लगभग 5 से 6 महीने तक जलमग्न रहती है। ऐसे में पारंपरिक फसलें उगाना लगभग असंभव था। लेकिन “वर्णम” स्टार्टअप की महिला उद्यमियों ने इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए मखाना जैसी जल-आधारित फसल को अपनाया। यह कदम न केवल कृषि नवाचार का उदाहरण है, बल्कि यह दिखाता है कि सही सोच और तकनीक के जरिए किसी भी कठिन परिस्थिति को सफलता में बदला जा सकता है।

दोनों ने मिलकर “वर्णम” के माध्यम से इस परियोजना को जमीन पर उतारा और यह साबित किया कि महिलाएं कृषि क्षेत्र में भी नेतृत्व कर सकती हैं। मखाना उत्पादन के लिए तकनीकी विशेषज्ञता मुख्य रूप से दरभंगा से प्राप्त की गई, जो मखाना उत्पादन का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इस परियोजना में Manigachimidas Farmer Producer Company Ltd. का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। कंपनी के चेयरमैन राजीव रंजन सहित विशेषज्ञों की टीम ने स्थल पर पहुंचकर किसानों और स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण दिया।
गंदासपुर गांव में इस परियोजना को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया है। शुरुआती परिणाम काफी उत्साहजनक रहे हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में इसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है।
मखाना खेती को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि यह किसानों के लिए बेहद लाभकारी विकल्प साबित हो सकता है:
- प्रति बीघा 8–10 किलोग्राम बीज की आवश्यकता
- उत्पादन: 4–6 क्विंटल तक
- बाजार मूल्य: ₹800 से ₹1200 प्रति किलोग्राम
- संभावित आय: ₹2 से ₹4 लाख प्रति बीघा
इस तरह यह खेती किसानों की आय को कई गुना बढ़ाने की क्षमता रखती है।यह पहल केवल एक नई फसल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कृषि विविधीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है। ऐसे क्षेत्रों में जहां पारंपरिक खेती संभव नहीं थी, वहां अब मखाना जैसी फसलें किसानों के लिए नया विकल्प बन सकती हैं।

इस कार्यक्रम में गणेश जोशी (कृषि मंत्री, उत्तराखंड) की उपस्थिति ने इस पहल को और मजबूती दी। उन्होंने कहा कि
इस प्रकार के नवाचार राज्य में कृषि के नए आयाम स्थापित कर सकते हैं और सरकार ऐसे प्रयासों को पूरा समर्थन देगी।
यह परियोजना उत्तराखंड और बिहार के बीच कृषि तकनीक और अनुभव के आदान-प्रदान का बेहतरीन उदाहरण है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि राज्यों के बीच सहयोग बढ़े, तो देश के कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव संभव हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह पायलट परियोजना सफल रहती है, तो उत्तराखंड में मखाना उत्पादन का एक संगठित क्लस्टर विकसित किया जा सकता है। इससे: ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी ,किसानों की आय बढ़ेगी ,रोजगार के अवसर बनेंगे
उत्तराखंड में मखाना खेती का यह प्रयोग केवल एक कृषि पहल नहीं, बल्कि एक नई सोच का प्रतीक है। यह दिखाता है कि सही रणनीति, तकनीकी सहयोग और मजबूत नेतृत्व के साथ कृषि क्षेत्र में क्रांति लाई जा सकती है। महिला उद्यमियों की यह पहल न केवल किसानों के लिए प्रेरणा है, बल्कि पूरे राज्य के लिए एक मॉडल बन सकती है।
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