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बिहार: राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के सामने अगले कुछ महीनों में अपनी पार्टी और परिवार की राजनीतिक स्थिति को लेकर बड़ी चुनौती बनी हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनके बेटे और मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य बनाए जाने से फिलहाल उनके मंत्री पद पर मंडरा रहा संवैधानिक संकट टलता नजर आ रहा है। हालांकि, विधान परिषद में उनका मौजूदा कार्यकाल मार्च 2027 में समाप्त होना है। ऐसे में आने वाले महीनों में भाजपा और उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक रिश्ते बिहार की सियासत में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
रालोमो अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने दीपक प्रकाश को विधान पार्षद बनवाकर सम्राट चौधरी सरकार में बेटे का मंत्री पद मार्च तक बचा लिया है। भाजपा में दल के विलय का दबाव झेल रहे कुशवाहा का रुख सात महीने बाद की राजनीति तय करेगा। बिहार में नया दल बनाने और उसका दूसरे दल में विलय करने के बाद तीसरा दल बनाने वाले नेता उपेंद्र कुशवाहा ने बेटे की कुर्सी बचाने के लिए येन-केन-प्रकारेण मंत्री दीपक प्रकाश को सात महीने वाला विधान पार्षद बनवा लिया है।
दीपक प्रकाश के MLC बनने से फिलहाल संकट टला
राजनीतिक घटनाक्रम के अनुसार दीपक प्रकाश को राज्यपाल की ओर से विधान पार्षद मनोनीत किया गया है। उनका मौजूदा कार्यकाल मार्च 2027 तक है। इसका सीधा असर उनके मंत्री पद पर पड़ने वाले संभावित संकट पर हुआ है, क्योंकि अब वे राज्य विधानमंडल के सदस्य हैं। संवैधानिक व्यवस्था के तहत किसी मंत्री को लगातार छह महीने से अधिक समय तक राज्य विधानमंडल का सदस्य बने बिना पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठ सकते हैं। इसी मुद्दे को लेकर दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। अब विधान परिषद की सदस्यता मिलने के बाद सरकार के लिए अदालत में यह पक्ष रखना संभव होगा कि दीपक प्रकाश विधानमंडल के सदस्य बन चुके हैं। हालांकि, पहले से दायर याचिका पर इसका अंतिम प्रभाव क्या होगा, यह अदालत की सुनवाई और आदेश के बाद ही स्पष्ट होगा।
लेकिन अगले सात महीने में उन्हें अपनी पार्टी आरएलएम का बीजेपी में विलय करने के ऑफर पर अपना मन बना लेना होगा। कुशवाहा का स्टैंड ही उनकी और परिवार की आगे की राजनीति तय करेगा। उपेंद्र कुशवाहा के सामने विकट संकट है। उनकी पार्टी के चार विधायक में पत्नी स्नेहलता कुशवाहा को छोड़कर बाकी तीन विधायक एक गुट की तरह पार्टी में बने हुए हैं। नीतीश कुमार ने जब पिछली सरकार में पहली बार दीपक प्रकाश को मंत्री बलाया था. तब कुछ दिन तक ऐसा माहोल बना रहा था कि रालोमो के तीन विधायक माधव आनंद, आलोक सिंह और रामेश्वर महतो पार्टी तोड़कर अब गए कि तब गए। लेकिन तब उपेंद्र कुशवाहा ने उनके बीच कुछ पद बांटकर संकट को सुलझा लिया था।
उपेंद्र कुशवाहा के सामने केवल बेटे की राजनीतिक स्थिति ही चुनौती नहीं है। उनकी पार्टी के विधायकों के बीच भी पहले राजनीतिक खींचतान की खबरें सामने आती रही हैं। आरएलएम के चार विधायकों में उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता कुशवाहा के अलावा माधव आनंद, आलोक सिंह और रामेश्वर महतो का नाम राजनीतिक चर्चाओं में रहा है। इससे पहले भी पार्टी के भीतर टूट की संभावनाओं को लेकर अटकलें लगती रही थीं। हालांकि, उपेंद्र कुशवाहा ने उस समय पार्टी के भीतर स्थिति को संभाल लिया था। लेकिन उस घटनाक्रम ने यह जरूर दिखाया कि छोटे दलों के लिए गठबंधन की राजनीति में अपने विधायकों और संगठन को एकजुट रखना कितनी बड़ी चुनौती हो सकती है।
लेकिन उस प्रकरण ने कुशवाहा को इशारों में समझा दिया था कि उनकी पार्टी की एकता तभी तक महफूज है, जब तक भाजपा उसे तोड़ना नहीं चाहती है।जब बिना किसी सदन का सदस्य बने दीपक प्रकाश के दोबारा मंत्री बनने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए सम्राट चौधरी सरकार से जवाब मांग लिया, तब यह मामला कुशवाहा के पक्ष में झुका। नहीं तो जून में ही 10 सीटों के लिए हुए एमएलसी चुनाव में दीपक को भाजपा ने मौका नहीं दिया। सूत्रों का कहना है कि रालोमो का भाजपा में विलय से इनकार करने के कारण ही जून वाली लिस्ट में दीपक का नाम शामिल नहीं हो सका, जिससे उनका मंत्री बने रहना मुश्किल होता जा रहा था। सुप्रीम कोर्ट में अगस्त के अंतिम हफ्ते में सुनवाई से पहले भाजपा ने खुद के एक एमएलसी का इस्तीफा करवाकर दीपक प्रकाश को उनकी जगह सदन में भेजा है। इसका असर सरकार के जवाब में दिखेगा,
दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर नियुक्ति से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बिना विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता के लंबे समय तक मंत्री पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सरकार से जवाब मांगा है और आगे की सुनवाई अगस्त के अंतिम सप्ताह में होने की बात सामने आई है। अब दीपक प्रकाश के विधान परिषद सदस्य बनने के बाद सरकार अदालत के सामने इस नए घटनाक्रम को रख सकती है। हालांकि, अदालत पहले की स्थिति को किस तरह देखती है और बाद में सदस्य बनने का प्रभाव लंबित याचिका पर कितना पड़ेगा, इस पर फिलहाल कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसका फैसला न्यायालय की आगे की कार्यवाही से ही स्पष्ट होगा।
उसी दिन के मुताबिक जारी रहेगी, ये आगे समझ आएगा। कोर्ट में मामला जब गया था, तब दीपक विधायक या एमएलसी बने बिना छह महीने से ज्यादा समय तक मंत्री रह चुके थे। पंजाब में इसी तरह के एक मामले में कोर्ट ने वर्षों बाद फैसला देकर एक मंत्री की नियुक्ति को अवैध और असंवैधानिक बताया था, जब वो सरकार भी नहीं बची थी।
पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दीपक प्रकाश को फिलहाल विधान परिषद की सदस्यता मिल गई है, लेकिन मार्च 2027 के बाद उनका राजनीतिक भविष्य फिर चर्चा में आ सकता है। उपेंद्र कुशवाहा को आने वाले महीनों में एक तरफ अपनी पार्टी की राजनीतिक पहचान और दूसरी तरफ भाजपा के साथ संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा। यदि आरएलएम भाजपा के साथ मौजूदा गठबंधन में बनी रहती है तो दीपक प्रकाश के राजनीतिक भविष्य को लेकर रास्ता अलग हो सकता है। वहीं, यदि दोनों दलों के समीकरण बदलते हैं तो मंत्री पद पर भी इसका असर पड़ सकता है। फिलहाल दीपक प्रकाश के MLC बनने से तत्काल संवैधानिक और राजनीतिक दबाव में राहत जरूर दिखाई दे रही है। लेकिन मार्च 2027 की समयसीमा और सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई आगे इस पूरे मामले की दिशा तय करने वाले दो अहम बिंदु रहेंगे।
ऐसा कोई फैसला दीपक प्रकाश के मामले में आगे आता है तो यह उनके साथ-साथ भाजपा के लिए भी असहज स्थिति हो सकती है दीपक का केस बंद नहीं हुआ तो कुशवाहा पर भी दबाव बना रहेगा। मार्च से पहले विलय का दबाव बढ़ेगा और ऐसा नहीं करने पर भाजपा दीपक प्रकाश की विदाई का रास्ता खोल देगी या उपेंद्र कुशवाहा दिल्ली से ब्रेक लगवाने में फिर कामयाब होंगे, यह समय बताएगा।
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