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मकर संक्रांति पर धार्मिक परंपरा का निर्वहन
उत्तराखंड के चमोली जनपद स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ श्री राजराजेश्वरी चंडिका देवी मंदिर, सिमली में मकर संक्रांति पर्व के अवसर पर सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं का विधिवत पालन किया गया। बुधवार को शुभ मुहूर्त में मंदिर के कपाट आगामी 15 दिनों के लिए बंद कर दिए गए। इस दौरान मंदिर परिसर भक्तिभाव और धार्मिक उल्लास से ओतप्रोत नजर आया।
मकर संक्रांति के पावन अवसर पर बुधवार सुबह मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया। मंदिर के मुख्य पुजारी प्रदीप गैरोला और कृष्णा गैरोला द्वारा वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ मां चंडिका की पूजा की गई। इस अवसर पर दुर्गा सप्तशती के पवित्र मंत्रों का पाठ करते हुए मां चंडिका का महाभिषेक संपन्न कराया गया।
महाभिषेक और 56 भोग का विशेष आयोजन
महाभिषेक के दौरान मां चंडिका को पंचामृत, गंगाजल और अन्य पवित्र सामग्रियों से स्नान कराया गया। इसके पश्चात देवी को खिचड़ी सहित 56 प्रकार के भोग अर्पित किए गए। मान्यता है कि मकर संक्रांति पर खिचड़ी का भोग अर्पित करने से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और क्षेत्र में सुख-समृद्धि बनी रहती है। धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक परंपराओं के अनुसार, बुधवार को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर मंदिर के कपाट विधिवत रूप से बंद किए गए। मंत्रोच्चारण और शंखध्वनि के बीच जैसे ही कपाट बंद हुए, श्रद्धालुओं ने मां चंडिका से क्षेत्र की सुख-शांति और कल्याण की कामना की।
15 दिनों तक बंद रहेंगे मंदिर के कपाट
मंदिर समिति के अनुसार, मकर संक्रांति के बाद हर वर्ष शीतकाल के इस विशेष काल में मंदिर के कपाट 15 दिनों के लिए बंद रखे जाते हैं। इस अवधि को देवी की विशेष साधना और विश्राम काल के रूप में देखा जाता है। कपाट बंद रहने के दौरान मंदिर में आम श्रद्धालुओं का प्रवेश नहीं होता, हालांकि परंपरागत पूजा-अर्चना नियमानुसार संपन्न की जाती रहती है।
इस महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर पर मंदिर समिति के कई पदाधिकारी और स्थानीय गणमान्य लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम में मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत टकोला, मालगुजार महिपाल लडोला, देवेंद्र सिंह नेगी, मनोज पुंडीर सहित अनेक श्रद्धालु और ग्रामीण उपस्थित रहे। सभी ने सामूहिक रूप से मां चंडिका की आराधना कर क्षेत्र की खुशहाली की कामना की। कपाट बंद होने से पूर्व बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे और मां चंडिका के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। भक्तों का कहना है कि राजराजेश्वरी चंडिका देवी क्षेत्र की कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं और यहां की परंपराएं लोगों की आस्था से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
श्री राजराजेश्वरी चंडिका देवी मंदिर का क्षेत्र में विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का भी प्रमुख प्रतीक माना जाता है। मकर संक्रांति पर कपाट बंद करने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ निभाया जाता है।
स्थानीय ग्रामीणों के लिए मकर संक्रांति और कपाट बंद होने का दिन विशेष महत्व रखता है। इस दिन लोग एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं देते हैं और देवी से परिवार व क्षेत्र की समृद्धि की कामना करते हैं। मंदिर परिसर में पूरे दिन भक्ति और श्रद्धा का वातावरण बना रहा। इस अवसर पर मंदिर समिति और स्थानीय प्रशासन द्वारा सुरक्षा और व्यवस्थाओं का भी विशेष ध्यान रखा गया। श्रद्धालुओं की सुविधा, पूजा व्यवस्था और परंपराओं के पालन को लेकर पूरी तैयारी की गई थी, जिससे कार्यक्रम शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।
कपाट खुलने का इंतजार
अब श्रद्धालु आगामी 15 दिनों के बाद मंदिर के कपाट पुनः खुलने का इंतजार करेंगे। मान्यता है कि कपाट खुलने के बाद देवी के दर्शन का विशेष फल प्राप्त होता है और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
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