सबसे सटीक ज्वालापुर टाइम्स न्यूज़…
रिपोर्टर (सचिन शर्मा)
उत्तराखंड के सरकारी और अर्ध-सरकारी विद्यालयों में बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन तैयार करने वाली भोजनमाताओं ने आखिरकार सरकार के खिलाफ निर्णायक कदम उठाने का ऐलान कर दिया है। वर्षों से उपेक्षा, शोषण और असुरक्षित भविष्य से जूझ रही भोजनमाताओं ने 2 फरवरी 2026 को राज्यव्यापी हड़ताल (खाना बनाना बंद) करने की घोषणा की है। इस हड़ताल से राज्य के हजारों स्कूलों में मिड डे मील व्यवस्था प्रभावित होने की संभावना है।
20–21 वर्षों की सेवा, फिर भी असुरक्षित भविष्य
भोजनमाताएं पिछले दो दशकों से अधिक समय से स्कूलों में बच्चों के लिए भोजन तैयार करने का कार्य कर रही हैं। इसके बावजूद आज तक उन्हें न तो स्थायी नौकरी का दर्जा मिला और न ही न्यूनतम वेतन का लाभ। भोजनमाताओं का कहना है कि वे लगातार अलग-अलग समय पर मुख्यमंत्री और शासन-प्रशासन के सामने अपनी समस्याएं रखती रही हैं, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिला, ठोस समाधान नहीं।
भोजनमाताओं का आरोप है कि उनसे माली, सफाई कर्मचारी, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी और भोजनमाता – चार कर्मचारियों के बराबर काम लिया जाता है। इसके बावजूद कभी बच्चों की संख्या कम होने का बहाना, कभी स्कूल विलय (मर्जर) और कभी उनके बच्चों के स्कूल में न पढ़ने जैसे फर्जी तर्क देकर उन्हें नौकरी से निकाले जाने की धमकी दी जाती है। यह स्थिति उनके मानसिक उत्पीड़न को और बढ़ा रही है।

चार साल से 3000 रुपये पर अटका मानदेय
भोजनमाताओं का वेतन पिछले चार वर्षों से मात्र 3000 रुपये प्रतिमाह पर स्थिर है, जो राज्य सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन के एक तिहाई से भी कम है। इसी दौरान उत्तराखंड सरकार ने न्यूनतम वेतन में 25 प्रतिशत की वृद्धि की, लेकिन भोजनमाताओं को इससे पूरी तरह वंचित रखा गया। भोजनमाताओं का कहना है कि बढ़ती महंगाई के दौर में इतने कम मानदेय में जीवन यापन करना लगभग असंभव हो गया है। उत्तराखंड सरकार द्वारा उन्हें “भोजनमाता” कहा जाता है, लेकिन भोजनमाताओं का कहना है कि यह केवल नाम का सम्मान है। वास्तविकता में उन्हें न तो कर्मचारी का दर्जा दिया गया और न ही सम्मानजनक वेतन। उनका स्पष्ट कहना है कि उन्हें किसी फर्जी सम्मान की नहीं, बल्कि एक इंसान और कर्मचारी के रूप में अधिकार चाहिए।
हाल ही में उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू की गई है। भोजनमाताओं का सवाल है कि जब सरकार “एक राज्य, एक कानून” की बात करती है, तो फिर वेतनमान में इतनी भारी असमानता क्यों? एक ओर 25 हजार से अधिक भोजनमाताएं न्यूनतम वेतन के लिए संघर्ष कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर विधायकों और जनप्रतिनिधियों के वेतन-भत्तों में लगातार बढ़ोतरी की जा रही है।
विधायकों के वेतन-भत्तों पर उठे सवाल
भोजनमाताओं ने बताया कि वर्ष 2018 से अब तक विधायकों के वेतन, भत्तों और पेंशन में दो से तीन बार वृद्धि की गई है। विधायकों का वेतन-भत्ता बढ़ाकर 2 लाख 90 हजार से 4 लाख रुपये किया गया, जबकि पेंशन 40 हजार से बढ़ाकर 60 हजार रुपये कर दी गई। भोजनमाताओं का कहना है कि एक ही राज्य में इतनी भारी आर्थिक असमानता सामाजिक अन्याय को दर्शाती है।
भोजनमाताओं ने अपनी मांगों को लेकर 2–3 जून को देहरादून में दो दिवसीय धरना प्रदर्शन भी किया था। उस दौरान शासन-प्रशासन की ओर से मौखिक आश्वासन दिए गए, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। इसी निराशा और मजबूरी के चलते अब भोजनमाताएं हड़ताल पर जाने को मजबूर हुई हैं।

2 फरवरी 2026 को हड़ताल का ऐलान
भोजनमाताओं ने साफ शब्दों में कहा है कि 2 फरवरी 2026 को वे राज्यभर में खाना बनाना बंद करेंगी। इस हड़ताल से होने वाली किसी भी अव्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी उत्तराखंड सरकार और शासन-प्रशासन की होगी। भोजनमाताओं का कहना है कि यह आंदोलन उनका अंतिम विकल्प है, क्योंकि अब उनके अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है।
न्यूनतम वेतनमान लागू किया जाए
भोजनमाताओं को स्थायी कर्मचारी का दर्जा मिले
नौकरी से निकाले जाने की धमकियां बंद हों
सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित किया जाए
यह भी पढ़ें– बसपा कार्यकर्ताओं में उत्साह बहन मायावती के 70वें जन्मदिन को जनकल्याणकारी दिवस के रूप में…
उत्तराखंड की सभी ताज़ा और महत्वपूर्ण ख़बरों के लिए ज्वालापुर टाइम्स न्यूज़ WHATSAPP GROUP से जुड़ें और अपडेट सबसे पहले पाएं
यहां क्लिक करें एक और हर अपडेट आपकी उंगलियों पर!
यदि आप किसी विज्ञापन या अपने क्षेत्र/इलाके की खबर को हमारे न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म पर प्रकाशित कराना चाहते हैं, तो कृपया 7060131584 पर संपर्क करें। आपकी जानकारी को पूरी जिम्मेदारी और भरोसे के साथ प्रसारित किया जाएगा।”

