नई टिहरी में महिलाओं द्वारा फूलों से तैयार किया जा रहा प्राकृतिक हर्बल गुलाल”नई टिहरी में महिलाओं द्वारा फूलों से तैयार किया जा रहा प्राकृतिक हर्बल गुलाल”

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बाजार में छाया महिलाओं द्वारा तैयार हर्बल गुलाल

होली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रंगों की रौनक बढ़ने लगी है। इस बार नई टिहरी में रानीचौरी क्षेत्र की महिलाओं द्वारा तैयार किया गया हर्बल गुलाल लोगों की पहली पसंद बनता जा रहा है। प्राकृतिक तरीके से तैयार किए गए इन रंगों की मांग लगातार बढ़ रही है। मानवाधिकार संरक्षण एवं ग्रामीण विकास समिति के अंतर्गत संचालित आराधना लघु उद्योग से जुड़ी महिला समूहों ने फूलों और प्राकृतिक सामग्री से सुरक्षित गुलाल तैयार कर बाजार में उतारा है। खास बात यह है कि यह गुलाल पूरी तरह केमिकल मुक्त और त्वचा के लिए सुरक्षित बताया जा रहा है।

महिला समूह पिछले करीब पंद्रह दिनों से होली की तैयारियों में जुटा हुआ था। अब तक लगभग आठ कुंतल हर्बल गुलाल तैयार किया जा चुका है। इसकी सप्लाई नई टिहरी, बौराड़ी, बीपुरम, कोटी कॉलोनी, चंबा, बादशाहीथौल, आगराखाल और नरेंद्रनगर सहित कई क्षेत्रों में की जा रही है। स्थानीय बाजारों के साथ-साथ ऑनलाइन माध्यम से भी ग्राहकों द्वारा हर्बल रंगों की मांग की जा रही है। संस्था की ओर से उपभोक्ताओं के घर तक रंग पहुंचाने की सुविधा भी दी जा रही है।

फूलों और सब्जियों से तैयार हो रहा सुरक्षित गुलाल

संस्था के अध्यक्ष Sanjay Bahuguna ने बताया कि हर्बल गुलाल को पूरी तरह प्राकृतिक सामग्री से तैयार किया जाता है। इसमें फूलों का बुरादा, सब्जियों का रस, अरारोट पाउडर और मुल्तानी मिट्टी का उपयोग किया जाता है। गेंदा, गुलाब और गुड़हल के फूलों की पंखुड़ियों को सुखाकर पीसा जाता है, जिसके बाद इसे अरारोट या कॉर्नफ्लोर के साथ मिलाकर मुलायम गुलाल बनाया जाता है।

  • चुकंदर से गुलाबी रंग
  • पालक से हरा रंग
  • गाजर से नारंगी रंग तैयार किया जाता है
  • खुशबू के लिए नींबू और चंदन तेल की बूंदें मिलाई जाती हैं, जिससे रंग प्राकृतिक सुगंध के साथ त्वचा के लिए सुरक्षित बनता है।

आराधना लघु उद्योग से जुड़ी Sushma Bahuguna ने बताया कि बादशाहीथौल बंगाचली सहकारिता मेले में लगाए गए स्टॉल पर मात्र सात दिनों में करीब दो कुंतल हर्बल गुलाल की बिक्री हुई। इससे साफ है कि लोग अब केमिकल युक्त रंगों की जगह प्राकृतिक और सुरक्षित विकल्प अपनाने लगे हैं।

हर्बल गुलाल का यह प्रयास केवल त्योहार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण का भी उदाहरण बन रहा है। स्थानीय महिलाओं को रोजगार मिलने के साथ उनकी आय में भी वृद्धि हो रही है। वहीं, प्राकृतिक रंगों के उपयोग से जल और पर्यावरण प्रदूषण कम करने में भी मदद मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे उत्पादों को सरकारी और सामाजिक स्तर पर प्रोत्साहन मिले तो ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

पहले बाजारों में मिलने वाले रासायनिक रंग त्वचा और आंखों के लिए हानिकारक साबित होते थे। लेकिन अब लोग स्वास्थ्य और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए हर्बल गुलाल की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। नई टिहरी की महिलाओं की यह पहल सुरक्षित, स्वदेशी और पर्यावरण मित्र होली मनाने का संदेश दे रही है।

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By ATHAR

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