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रांची/दिल्ली, 4 अगस्त।
झारखंड की राजनीति के पितामह, आदिवासी अधिकारों की बुलंद आवाज़, तीन बार के मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक नेता शिबू सोरेन का सोमवार सुबह निधन हो गया।
81 वर्षीय सोरेन पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में जीवन और मौत की जंग लड़ रहे थे।
सुबह 8:56 बजे, उन्होंने अंतिम सांस ली।
किडनी से लेकर ब्रेन स्ट्रोक तक—बीमारी ने छीन लिया आदिवासी नेता का जीवन

19 जुलाई को किडनी से जुड़ी तकलीफ के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
डॉक्टरों के अनुसार, उनकी बाईपास सर्जरी पहले ही हो चुकी थी, और बढ़ती उम्र की वजह से रिकवरी बेहद धीमी हो रही थी। इसके अलावा उन्हें डायबिटीज, फेफड़े की बीमारी और हाल ही में ब्रेन स्ट्रोक भी आया, जिससे उनका बायां हिस्सा पैरलाइज़ हो गया था। उनकी देखरेख में झारखंड के मुख्यमंत्री और पुत्र हेमंत सोरेन और बहू कल्पना सोरेन लगातार दिल्ली में मौजूद रहे।
“मैं शून्य हो गया हूँ…” – बेटे हेमंत सोरेन की भावुक श्रद्धांजलि
अपने पिता के निधन पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा:
“आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूँ…”
उनकी इस पोस्ट ने पूरे झारखंड में भावनाओं का सैलाब ला दिया।
राज्य में हर ओर शोक की लहर फैल गई। सड़कों, सरकारी दफ्तरों और गाँवों से लेकर राजधानी रांची तक ‘गुरुजी’ की यादों का दौर चल पड़ा।
राजनीतिक हस्तियों ने जताया दुख, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा – “जमीनी नेता थे”
शिबू सोरेन के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गहरा शोक जताया। उन्होंने अपने एक्स पोस्ट में लिखा:
“शिबू सोरेन जी एक जमीनी नेता थे, जिन्होंने आदिवासी समुदाय, गरीबों और वंचितों के अधिकारों के लिए जीवन समर्पित किया। उनका जाना लोकतंत्र के एक मजबूत स्तंभ का खो जाना है।”
पीएम मोदी ने हेमंत सोरेन से फोन पर बात कर संवेदना भी प्रकट की।
कांग्रेस के नेता राहुल गांधी, जो कुछ दिन पहले ही सोरेन से मिलने अस्पताल पहुंचे थे, ने भी अपने शोक संदेश में उन्हें “सच्चा आदिवासी हितैषी” बताया।
गुरुजी की जीवनगाथा: संघर्ष, राजनीति और जनता से जुड़ाव
- जेएमएम (झारखंड मुक्ति मोर्चा) के संस्थापक
- तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री
- सात बार लोकसभा सांसद
- 2004 में कोयला मंत्री (यूपीए सरकार में)
- चिरूडीह कांड में विवाद और इस्तीफा
- ‘दिशोम गुरुजी’ के नाम से लोकप्रिय
उनका जीवन आदिवासी समाज के हक और हिम्मत की कहानी रहा है।
बचपन से ही गरीबी, शोषण और जमीन संघर्ष में पले-बढ़े शिबू सोरेन ने राजनीति को जनता से सीधा जोड़ा, और इसी जुड़ाव ने उन्हें झारखंड का सबसे बड़ा नाम बना दिया।
अंतिम यात्रा झारखंड में होगी, जनता कर रही है इंतज़ार

शिबू सोरेन की अंतिम यात्रा झारखंड में उनके पैतृक गांव से निकाली जाएगी।
झारखंड सरकार ने शोक की घोषणा कर दी है और झारखंड के लोग गुरुजी को अंतिम बार देखने के लिए उमड़ पड़े हैं। शिबू सोरेन अब भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी संघर्ष की कहानी, गरीबों और आदिवासियों के लिए उनकी लड़ाई और झारखंड राज्य के गठन में उनकी भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। झारखंड की मिट्टी ने एक योद्धा को खो दिया है, लेकिन उसकी गूंज सदियों तक सुनाई देगी।
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