रिपोर्टर (सचिन शर्मा)
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हरिद्वार 2026। भारतीय ज्ञान परंपरा, सनातन मूल्यों और हिंदू दर्शन के अध्ययन एवं प्रसार को लेकर आयोजित होने जा रहे 52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। यह सम्मेलन 29 से 31 अक्टूबर 2026 तक हरिद्वार स्थित पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित किया जाएगा। इसमें देश-विदेश के विद्वान, शिक्षाविद और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विशेषज्ञ प्राच्यविद्या, भारतीय दर्शन, संस्कृत, इतिहास और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श करेंगे।
योगगुरु स्वामी रामदेव और पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य बालकृष्ण ने मंगलवार को विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन स्थित कॉन्फ्रेंस हॉल में सम्मेलन की तैयारियों की समीक्षा की। इस दौरान आयोजन से जुड़े विभिन्न विभागों और टीमों ने अपनी तैयारियों की जानकारी साझा की। समीक्षा बैठक में व्यवस्थाओं की गुणवत्ता, अनुशासन, समयबद्ध तैयारी और विभागों के बीच समन्वय पर जोर दिया गया। vस्वामी रामदेव ने कहा कि अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति और प्राचीन ज्ञान परंपरा के चिंतन, संरक्षण और प्रसार का महत्वपूर्ण अवसर है। उनके अनुसार भारतीय दर्शन में निहित नैतिकता, कर्तव्यबोध, समत्व और मानव कल्याण की अवधारणाएं आज के वैश्विक समाज के लिए भी प्रासंगिक हैं।
भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच देने का प्रयास
स्वामी रामदेव ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा वेदों, दर्शन, संस्कृत, आध्यात्मिक चिंतन और नैतिक मूल्यों से समृद्ध रही है। इस विरासत को समझने के लिए प्राच्यविद्या का गंभीर अध्ययन आवश्यक है। उनके अनुसार ऐसे सम्मेलन भारतीय ज्ञान-विरासत को समकालीन संदर्भों में समझने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर देते हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में धर्म, कर्तव्य और मानव कल्याण से जुड़े विचारों का महत्वपूर्ण स्थान है। इन विचारों का अध्ययन केवल ऐतिहासिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक और शैक्षणिक संदर्भों में भी उपयोगी हो सकता है। सम्मेलन में भारतीय दर्शन, संस्कृत, इतिहास और संस्कृति से जुड़े विषयों पर चर्चा की जाएगी। इसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों को एक साझा मंच उपलब्ध कराना और भारतीय ज्ञान परंपरा के अलग-अलग आयामों पर शैक्षणिक संवाद को आगे बढ़ाना है।

52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन का आयोजन 29 से 31 अक्टूबर तक पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार में प्रस्तावित है। तीन दिवसीय आयोजन में भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन साहित्य, दर्शन, संस्कृत भाषा और सांस्कृतिक विरासत से संबंधित विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। देश-विदेश से आने वाले विद्वानों की भागीदारी सम्मेलन को शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाएगी। ऐसे आयोजनों में विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ अपने अध्ययन, शोध और विचार साझा करते हैं, जिससे संबंधित क्षेत्रों में संवाद और शोध की संभावनाएं विकसित होती हैं।
आयोजन की तैयारियों को लेकर विश्वविद्यालय स्तर पर विभिन्न विभागों को जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। समीक्षा बैठक में संबंधित टीमों ने अपनी तैयारियों और व्यवस्थाओं की जानकारी दी। स्वामी रामदेव ने सभी विभागों से समन्वय के साथ काम करने का आह्वान किया, ताकि सम्मेलन निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आयोजित हो सके।
सनातन शास्त्र विमर्श’ में शिक्षा और संस्कृत पर होगी चर्चा
स्वामी रामदेव ने 30 अक्टूबर को प्रस्तावित ‘सनातन शास्त्र विमर्श’ को सम्मेलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और शिक्षाविदों के बीच संवाद का मंच बनेगा। इसमें भविष्य की शिक्षा, संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन और भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान और कौशल हासिल करना नहीं होना चाहिए। विद्यार्थियों में नैतिकता, कर्तव्यबोध, सांस्कृतिक चेतना और मानव कल्याण की भावना विकसित करना भी शिक्षा का महत्वपूर्ण पक्ष है। उनके अनुसार भारतीय शास्त्रीय ज्ञान और आधुनिक शिक्षा के बीच सार्थक समन्वय स्थापित करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर प्रयास करने होंगे। इससे नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझते हुए आधुनिक समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हो सकेगी।
संस्कृत भाषा के अध्ययन और संरक्षण को लेकर भी विमर्श में महत्वपूर्ण विषय सामने रखे जाने की संभावना है। संस्कृत में उपलब्ध साहित्य, दर्शन और शास्त्रीय ग्रंथ भारतीय बौद्धिक परंपरा के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इनके अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका पर चर्चा की जाएगी।
स्वामी रामदेव ने युवा पीढ़ी में भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों और हिंदू दर्शन के प्रति सम्मान तथा आत्मबोध विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने आदि शंकराचार्य की दृष्टि का उल्लेख करते हुए धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के बीच सहयोग एवं समन्वय को महत्वपूर्ण बताया।
उनके अनुसार भारतीय ज्ञान-विरासत को व्यापक शैक्षणिक विमर्श से जोड़ने के लिए अलग-अलग संस्थाओं की साझा पहल उपयोगी हो सकती है। इससे पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक अध्ययन पद्धतियों के बीच संवाद को आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है। सम्मेलन के माध्यम से भारतीय संस्कृति और दर्शन से जुड़े विषयों पर गंभीर चर्चा को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जा रहा है। आयोजन में विद्वानों के विचारों और शोध के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न पक्षों को समझने का अवसर मिलेगा।
सम्मेलन की तैयारियों की समीक्षा के दौरान स्वामी रामदेव ने संबंधित विभागों से अपने दायित्वों का निर्वहन तत्परता, गुणवत्ता, अनुशासन और आपसी समन्वय के साथ करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि व्यापक स्तर के आयोजन की सफलता के लिए सूक्ष्म योजना, टीम भावना और समर्पण आवश्यक हैं।
बैठक में विभिन्न टीमों ने अपनी तैयारियों और व्यवस्थाओं की जानकारी साझा की। आयोजन से संबंधित कार्यों को समय पर पूरा करने तथा विभागीय समन्वय बनाए रखने पर जोर दिया गया। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित होने वाले सम्मेलन में देश-विदेश से आने वाले प्रतिभागियों के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं करना भी तैयारियों का हिस्सा है। इस तरह के आयोजन में कार्यक्रम संचालन, प्रशासनिक प्रबंधन, सुरक्षा, तकनीकी सहायता और संप्रेषण जैसे विभागों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
बैठक में विश्वविद्यालय के अधिकारी और कर्मचारी रहे मौजूद
सम्मेलन की समीक्षा बैठक में पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य बालकृष्ण, प्रति कुलपति साध्वी देवप्रिया, डॉ. वेदप्रिया, क्रय समिति की अध्यक्ष बहन अंशुल, संप्रेषण विभाग प्रमुख बहन पारुल और संकायाध्यक्ष मयंक अग्रवाल उपस्थित रहे। इसके अलावा सम्मेलन के समन्वयक, शिक्षकगण तथा आईटी, प्रशासन, सुरक्षा, लेखा और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी भी बैठक में शामिल हुए। सभी ने आयोजन से जुड़ी तैयारियों और व्यवस्थाओं के संबंध में जानकारी साझा की। बैठक में विभागों के बीच समन्वय बनाए रखने और निर्धारित जिम्मेदारियों को समय पर पूरा करने पर जोर दिया गया। विश्वविद्यालय की ओर से सम्मेलन को व्यवस्थित ढंग से आयोजित करने के लिए तैयारियां की जा रही हैं।
52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत, दर्शन और संस्कृति से जुड़े विषयों पर विद्वानों को विचार-विमर्श का अवसर उपलब्ध कराना है। सम्मेलन में पारंपरिक ज्ञान के अध्ययन के साथ उसे वर्तमान शैक्षणिक संदर्भों में समझने पर भी चर्चा होगी।
स्वामी रामदेव के अनुसार भारतीय दर्शन में निहित नैतिक मूल्यों और मानव कल्याण की अवधारणाओं को समझना आज भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने सम्मेलन को सनातन मूल्यों और भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों पर चिंतन का अवसर बताया। हरिद्वार स्थित पतंजलि विश्वविद्यालय में 29 से 31 अक्टूबर तक आयोजित होने वाला यह सम्मेलन भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर शैक्षणिक संवाद का मंच बनेगा। आयोजन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं और विश्वविद्यालय के संबंधित विभाग व्यवस्थाओं को पूरा करने में जुटे हैं।
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