“बॉम्बे हाईकोर्ट में इमरजेंसी पैरोल की याचिका दाखिल करने वाला अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम”“बॉम्बे हाईकोर्ट में इमरजेंसी पैरोल की याचिका दाखिल करने वाला अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम”

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नई दिल्ली
1993 के मुंबई सीरियल बम धमाकों के मामले में दोषी करार दिए जा चुके और नासिक सेंट्रल जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे कुख्यात अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम ने एक बार फिर सुर्खियां बटोर ली हैं। हाल ही में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम को मिली पैरोल के बाद अब अबू सलेम ने भी इमरजेंसी पैरोल की मांग करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया है। अबू सलेम ने अपनी याचिका में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में स्थित अपने पैतृक गांव जाने की अनुमति मांगी है। याचिका में उसने अपने बड़े भाई की मौत का हवाला देते हुए पारिवारिक और धार्मिक कारणों से कुछ समय के लिए जेल से बाहर जाने की अनुमति देने की अपील की है।

बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल की याचिका

कानूनी सूत्रों के अनुसार, अबू सलेम की ओर से दाखिल याचिका में स्पष्ट किया गया है कि यह मांग नियमित नहीं बल्कि इमरजेंसी पैरोल के तहत की गई है। सलेम फिलहाल महाराष्ट्र की नासिक सेंट्रल जेल में बंद है और वह गंभीर अपराधों में दोषी होने के कारण उच्च श्रेणी का कैदी माना जाता है। याचिका में अदालत से यह आग्रह किया गया है कि मानवीय आधार पर उसे सीमित अवधि के लिए अपने गांव जाने की अनुमति दी जाए, ताकि वह अपने दिवंगत भाई से जुड़ी धार्मिक रस्में पूरी कर सके।

भाई की मौत का दिया हवाला

अबू सलेम ने अपनी याचिका में बताया है कि उसके बड़े भाई अबू हाकिम अंसारी का 14 नवंबर 2025 को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। सलेम के अनुसार, उसका अपने भाई से बेहद करीबी रिश्ता था और वह उन्हें पिता समान मानता था।

याचिका में कहा गया है कि वह:

  • भाई की 40वीं दिन की धार्मिक रस्में निभाना चाहता है,
  • कुरान ख्वानी कराना चाहता है,
  • कब्रिस्तान में जाकर दुआ पढ़ना चाहता है,
  • और शोकाकुल परिवार के सदस्यों से मुलाकात करना चाहता है।
  • इन्हीं कारणों को आधार बनाकर उसने इमरजेंसी पैरोल की मांग की है।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि जब उसके भाई की तबीयत गंभीर थी, तब अबू सलेम ने जेल प्रशासन से नियमित पैरोल की प्रक्रिया तेज करने का अनुरोध किया था। उसका कहना है कि वह अपने भाई से उनके जीवनकाल में आखिरी मुलाकात करना चाहता था।

हालांकि, उस समय प्रशासन की ओर से अनुमति नहीं मिल सकी और उनके भाई का निधन हो गया। अब सलेम का तर्क है कि कम से कम वह अंतिम धार्मिक रस्मों में शामिल होकर अपने पारिवारिक दायित्वों को निभाना चाहता है।

राम रहीम के बाद पैरोल पर फिर बहस

गौरतलब है कि हाल के दिनों में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम को भी पैरोल पर जेल से बाहर आने की अनुमति मिली थी। राम रहीम रेप और हत्या जैसे संगीन मामलों में सजा काट रहा है। उसके पैरोल पर बाहर आने के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी बहस देखने को मिली थी।अब अबू सलेम की पैरोल याचिका सामने आने के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगे हैं कि:

  • क्या गंभीर अपराधों में दोषी कैदियों को पैरोल दी जानी चाहिए?
  • क्या पैरोल व्यवस्था का समान रूप से पालन हो रहा है?
  • और क्या मानवीय आधार पर दी जाने वाली राहत से न्याय व्यवस्था की सख्ती कमजोर पड़ती है?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, पैरोल कोई अधिकार नहीं बल्कि एक विशेषाधिकार है, जो कैदी के अच्छे आचरण और मानवीय परिस्थितियों को देखते हुए दिया जाता है। इमरजेंसी पैरोल आमतौर पर:

  • परिवार में मृत्यु,
  • गंभीर बीमारी,
  • या अन्य असाधारण परिस्थितियों

में सीमित अवधि के लिए दी जाती है। हालांकि, आतंकवाद, संगठित अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में दोषी कैदियों के लिए पैरोल के नियम अपेक्षाकृत सख्त होते हैं।

अबू सलेम की याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट क्या रुख अपनाता है, इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। अदालत याचिका पर सुनवाई के दौरान:

  • अपराध की प्रकृति,
  • कैदी का आपराधिक रिकॉर्ड,
  • सुरक्षा जोखिम,
  • और प्रशासन की रिपोर्ट
  • जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला ले सकती है।

समाज और न्याय व्यवस्था के बीच संतुलन

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में अदालतों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मानवीय आधार और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की होती है। एक ओर अपराध की गंभीरता है, तो दूसरी ओर परिवार और धार्मिक कर्तव्यों का प्रश्न।अबू सलेम की पैरोल याचिका इसी संवेदनशील संतुलन की परीक्षा मानी जा रही है।

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By ATHAR

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