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विकासनगर/पिथौरागढ़। उत्तराखंड में किसानों की आय बढ़ाने और औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है। परफ्यूमरी एवं सुगंध अनुसंधान एवं विकास संस्थान (पारडी), सेलाकुई द्वारा पिथौरागढ़ जिले के किसानों को तिमूर (Timur) के पौधे निशुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं। पहले चरण में लगभग 20 हजार उच्च गुणवत्ता वाले पौधों का वितरण किया जाएगा, जिससे किसानों को पारंपरिक खेती के साथ अतिरिक्त आय का अवसर मिलेगा। यह अभियान खासतौर पर पर्वतीय और सीमांत क्षेत्रों के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि तिमूर की खेती भविष्य में उत्तराखंड के किसानों के लिए आय का मजबूत स्रोत बन सकती है।
किसानों को मुफ्त में बांटे जा रहे तिमूर के पौधे विकासनगर(आरएनएस)। प्रदेश में सुगंधित एवं औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने तथा किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से परफ्यूमरी एवं सुगंध अनुसंधान एवं विकास संस्थान सेलाकुई की ओर से विशेष अभियान चलाया जा रहा है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाला तिमूर एक महत्वपूर्ण औषधीय एवं सुगंधित पौधा है। इसके बीज और तेल का उपयोग दवा, कॉस्मेटिक, आयुर्वेद और परफ्यूम उद्योग में किया जाता है। बढ़ती मांग को देखते हुए राज्य में इसकी व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है। इस अभियान के तहत किसानों को निशुल्क पौधे देने के साथ-साथ उनकी खेती और रखरखाव की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाएगी ताकि बेहतर उत्पादन प्राप्त हो सके।
अभियान के तहत जनपद पिथौरागढ़ के सीमांत एवं पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों को तिमूर के पौधे निशुल्क वितरित किए जा रहे हैं। तिमूर उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की एक महत्वपूर्ण औषधीय एवं सुगंधित प्रजाति है। इसके बीज और तेल की मांग फार्मास्यूटिकल, कॉस्मेटिक और परफ्यूम उद्योग में लगातार बढ़ रही है। इसी को देखते हुए डाबर इंडिया लिमिटेड और पारडी के बीच एमओयू किया गया है। डाबर इंडिया के प्रतिनिधि डॉ. पंकज रतूड़ी के अनुसार कंपनी की नर्सरी से करीब 20 हजार उच्च गुणवत्ता वाले तिमूर के पौधे पारडी को उपलब्ध कराए जाएंगे। संस्थान ने 10 जुलाई 2026 से किसानों के खेतों तक पौधे पहुंचाने का अभियान शुरू कर दिया है।
20 हजार पौधे किसानों तक पहुंचाए जाएंगे
अभियान के तहत डाबर इंडिया लिमिटेड और परफ्यूमरी एवं सुगंध अनुसंधान एवं विकास संस्थान (पारडी) के बीच हुए समझौते (एमओयू) के अनुसार डाबर की नर्सरी से लगभग 20 हजार पौधे उपलब्ध कराए जाएंगे। इन पौधों को चरणबद्ध तरीके से किसानों के खेतों तक पहुंचाया जाएगा। संस्थान ने 10 जुलाई 2026 से वितरण अभियान शुरू कर दिया है। पहले चरण में पिथौरागढ़ जिले के निम्न विकासखंडों के किसानों को योजना से जोड़ा गया है— मुनस्यारी धारचूला विण कनालीछीना डीडीहाट गंगोलीहाट मूनाकोट इन क्षेत्रों में लगभग 20 हेक्टेयर भूमि पर तिमूर की खेती कराई जाएगी।
संस्थान के अधिकारियों के अनुसार इस योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों को केवल पारंपरिक खेती तक सीमित न रखते हुए उन्हें उच्च मूल्य वाली औषधीय फसलों से जोड़ना है। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में सीमित कृषि भूमि होने के कारण कम क्षेत्रफल में अधिक आय देने वाली फसलें किसानों के लिए अधिक लाभदायक साबित हो सकती हैं।
प्रथम चरण में पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी, धारचूला, विण, कनालीछीना, डीडीहाट, गंगोलीहाट और मूनाकोट विकासखंडों में लगभग 20 हेक्टेयर क्षेत्रफल में तिमूर की खेती कराई जाएगी। संस्थान के निदेशक डॉ. नृपेन्द्र चौहान ने बताया कि योजना का उद्देश्य किसानों को पारंपरिक खेती के साथ उच्च मूल्य वाली सुगंधित फसलों से जोड़कर उनकी आय बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि सीमांत क्षेत्रों में जंगली जानवरों की समस्या और पलायन जैसी चुनौतियों के बीच तिमूर की खेती किसानों के लिए बेहतर और सुरक्षित आजीविका का माध्यम बन सकती है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन को देखते हुए यह योजना महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि किसानों को अपने गांव में ही बेहतर आय का साधन मिलेगा तो रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कम हो सकता है। इसके साथ ही तिमूर की खेती जंगली जानवरों से होने वाले नुकसान की समस्या से भी अपेक्षाकृत कम प्रभावित बताई जाती है। संस्थान के निदेशक डॉ. नृपेन्द्र चौहान ने बताया कि इस योजना का उद्देश्य किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती की अपार संभावनाएं हैं। यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से खेती करेंगे तो उन्हें भविष्य में अच्छा आर्थिक लाभ मिल सकता है।
तिमूर के पौधों के निशुल्क वितरण की जानकारी मिलने के बाद सीमांत क्षेत्रों के किसानों में उत्साह देखा जा रहा है। किसानों का मानना है कि यदि उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार दोनों मिलते हैं तो यह खेती उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती है। विशेषज्ञों का भी कहना है कि उत्तराखंड की जलवायु तिमूर की खेती के लिए अनुकूल है, जिससे भविष्य में इसका उत्पादन और बढ़ सकता है। उत्तराखंड सरकार और संबंधित संस्थानों की यह पहल पर्वतीय किसानों के लिए नई संभावनाएं लेकर आई है। तिमूर जैसी औषधीय एवं सुगंधित फसलें किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दे सकती हैं। यदि योजना का प्रभावी क्रियान्वयन जारी रहा तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड औषधीय पौधों की खेती का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
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