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उत्तराखंड के विकासनगर क्षेत्र अंतर्गत त्यूणी में सोमवार को एक सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें सनातन धर्म, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने का संदेश दिया गया। सम्मेलन में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, सामाजिक कार्यकर्ता और धर्मप्रेमी नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में आपसी समरसता बढ़ाना और जाति, वर्ग जैसी विभाजनकारी सोच से ऊपर उठकर एकजुट होने का आह्वान करना रहा।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सजी सम्मेलन की शुरुआत
सम्मेलन की शुरुआत धार्मिक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ हुई। इस अवसर पर धार्मिक भजन, सांस्कृतिक नृत्य, देशभक्ति गीतों का सामूहिक गायन और शिव तांडव जैसे कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। इन प्रस्तुतियों ने उपस्थित लोगों में उत्साह और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार किया। कार्यक्रम स्थल पर पारंपरिक वेशभूषा, ध्वज और सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से सनातन परंपरा की झलक देखने को मिली। आयोजकों का कहना था कि इस तरह के कार्यक्रमों से युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में मदद मिलती है।
जातिवाद छोड़कर एकजुट होने का संदेश
सम्मेलन के मुख्य वक्ता आरएसएस के प्रांत संगठन मंत्री अजय ने अपने संबोधन में समाज को एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि जब भी हिंदू समाज बंटा है, तब-तब बाहरी शक्तियों को इसका लाभ मिला है।
उन्होंने कहा,
विदेशी आक्रांताओं का उद्देश्य रहा कि जिसे तलवार से नहीं काटा जा सकता, उसे जातियों में बांट दो। यही कारण है कि समाज को कमजोर करने के लिए जातिवाद को बढ़ावा दिया गया।”
सिर्फ हिंदू बनें, यही समय की मांग”
अजय ने कहा कि आज समय आ गया है कि समाज जातिवाद को भूलकर केवल हिंदू के रूप में अपनी पहचान बनाए। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि हिंदुओं को संगठित करने का कार्य किसी एक संगठन या व्यक्ति का नहीं, बल्कि प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य है। उनका कहना था कि समाज जितना संगठित होगा, उतना ही मजबूत राष्ट्र का निर्माण होगा। जातिगत भेदभाव समाज की शक्ति को कमजोर करता है और इसे समाप्त करना जरूरी है।
अपने संबोधन में अजय ने भारत की वैश्विक भूमिका पर भी बात रखी। उन्होंने कहा कि यदि भारत विश्वगुरु बनता है, तो इसका लाभ केवल भारत को नहीं, बल्कि पूरे विश्व को शांति और स्थिरता के रूप में मिलेगा। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा सदैव वसुधैव कुटुंबकम् की भावना पर आधारित रही है और यही सोच विश्व को दिशा दे सकती है।
अजय ने कहा कि भारतीय समाज के अंदर वीरता की कोई कमी नहीं है, बल्कि आवश्यकता बेहतर योजना और संगठन की है। उन्होंने कहा कि इतिहास में भारत ने कई बार यह सिद्ध किया है कि जब समाज संगठित हुआ, तब बड़े से बड़े संकट का सामना किया गया। उन्होंने कहा कि आज हिंदू समाज धीरे-धीरे संगठित हो रहा है और यह एक सकारात्मक संकेत है।
अपने संबोधन के दौरान अजय ने संस्कारों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा,
“शरीर में खून के साथ संस्कार भी बहने चाहिए। केवल शारीरिक शक्ति ही नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक शक्ति भी उतनी ही आवश्यक है।” उन्होंने कहा कि परिवार, समाज और शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से संस्कारों को मजबूत करना राष्ट्र निर्माण की नींव है।
युवाओं की रही विशेष भागीदारी
सम्मेलन में युवाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। आयोजकों का कहना था कि युवा वर्ग में सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना जाग्रत करना इस सम्मेलन का एक प्रमुख उद्देश्य था। युवाओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और वक्ताओं की बातों को ध्यानपूर्वक सुना। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह के आयोजन समाज को सकारात्मक दिशा देने में सहायक होते हैं।
वक्ताओं ने कहा कि समाज में आपसी भाईचारा, समरसता और सहयोग की भावना को मजबूत करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। जाति, वर्ग और क्षेत्र के भेदभाव से ऊपर उठकर ही समाज आगे बढ़ सकता है। सम्मेलन के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने सामाजिक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखने का संकल्प लिया।
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