रिपोर्टर (सचिन शर्मा)
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रायसी, हरिद्वार। मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए रासायनिक उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल जरूरी है। इसके साथ ही किसानों को जैविक खाद और जैव उर्वरकों को भी कृषि पद्धति का हिस्सा बनाना चाहिए। स्वस्थ मृदा ही बेहतर और गुणवत्तापूर्ण फसल उत्पादन का आधार है। यह बात रायसी स्थित हर्ष विद्या मंदिर कॉलेज में आयोजित किसान सभा, संगोष्ठी एवं कार्यशाला में विशेषज्ञों ने कही।
कॉलेज के जंतु विज्ञान विभाग और कृभको के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय कार्यक्रम में किसानों और छात्र-छात्राओं को जैविक खाद, जैव उर्वरक, मृदा स्वास्थ्य, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी गई। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने खेती में पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग के साथ मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने की जरूरत पर चर्चा की।
दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ
कार्यक्रम का शुभारंभ कॉलेज प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉ. केपी सिंह, सचिव एवं ब्लॉक प्रमुख डॉ. हर्ष कुमार दौलत, प्राध्यापक डॉ. अजीत कुमार राव, मुख्य अतिथि अनीश अहमद अंसारी तथा कृभको अधिकारी नितेश राजपूत ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया। कार्यक्रम में कॉलेज के शिक्षक, विद्यार्थी और क्षेत्र के किसान शामिल हुए। संगोष्ठी का उद्देश्य किसानों और शिक्षण संस्थान के बीच संवाद स्थापित कर कृषि से जुड़े वैज्ञानिक विषयों को सरल एवं व्यावहारिक तरीके से समझाना रहा।
जंतु विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. नेहा सिंह ने अतिथियों, किसानों और विद्यार्थियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि किसानों और शिक्षण संस्थानों के बीच संवाद से कृषि के क्षेत्र में वैज्ञानिक सोच और आधुनिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने में मदद मिलती है। ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को कृषि से जुड़े विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों से सीधे जानकारी प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

रसायन विज्ञान विभाग की डॉ. अलका ने रासायनिक उर्वरकों के संतुलित प्रयोग की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जरूरत से अधिक उर्वरक का इस्तेमाल मृदा, जल और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। वहीं कृभको अधिकारी नितेश राजपूत ने जैविक खाद एवं जैव उर्वरकों के उपयोग और टिकाऊ कृषि में उनकी भूमिका की जानकारी दी। वनस्पति विज्ञान विभाग के डॉ. नरेंद्र कुमार ने मृदा स्वास्थ्य और फसल पोषण पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही गुणवत्तापूर्ण उत्पादन का आधार है। उन्होंने किसानों को संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने के लिए प्रेरित किया।
संगोष्ठी के दौरान किसानों और विद्यार्थियों ने विशेषज्ञों से कृषि, उर्वरक प्रबंधन एवं मृदा स्वास्थ्य से जुड़े सवाल पूछे, जिनका विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक समाधान बताया। कार्यशाला में किसानों, विद्यार्थियों और शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम के आयोजन में नितेश राजपूत, डॉ. नेहा सिंह और असिस्टेंट प्रोफेसर रश्मि नौटियाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. प्रकृति द्विवेदी, दीपक कुमार और डॉ. वर्षा रानी का विशेष योगदान रहा। इस दौरान डॉ. प्रियंका सैनी, डॉ. मंजू रानी, डॉ. हेमंत, डॉ. प्रदीप, डॉ. ललित मोहन, डॉ. मनोज, डॉ. स्मृति और डॉ. शिल्पी समेत महाविद्यालय के शिक्षक एवं कर्मचारी मौजूद रहे। अंत में रश्मि नौटियाल ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, किसानों एवं विद्यार्थियों का आभार जताया।
वनस्पति विज्ञान विभाग के डॉ. नरेंद्र कुमार ने मृदा स्वास्थ्य और फसल पोषण पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पादन का आधार है। मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों का संतुलन फसल की वृद्धि और उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने किसानों को संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने के लिए प्रेरित किया। साथ ही मिट्टी के स्वास्थ्य को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए कृषि संबंधी निर्णय वैज्ञानिक जानकारी और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लेने की जरूरत बताई।
विशेषज्ञों ने किसानों को यह समझाने का प्रयास किया कि खेत की मिट्टी की स्थिति को नजरअंदाज कर लगातार एक ही प्रकार के उर्वरक का इस्तेमाल करना उचित कृषि प्रबंधन नहीं माना जा सकता। फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार पोषक तत्वों का प्रबंधन करना अधिक उपयोगी हो सकता है। संगोष्ठी के दौरान किसानों और छात्र-छात्राओं को विशेषज्ञों से सीधे संवाद करने का अवसर मिला। प्रतिभागियों ने कृषि, उर्वरक प्रबंधन, जैविक खाद, जैव उर्वरक और मृदा स्वास्थ्य से जुड़े सवाल पूछे।
विशेषज्ञों ने किसानों और विद्यार्थियों के सवालों का वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक तरीके से समाधान बताया। इस दौरान खेती में उर्वरकों के संतुलित उपयोग और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई। कार्यशाला में किसानों, विद्यार्थियों और शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। आयोजकों के अनुसार इस तरह के संवाद कार्यक्रम किसानों तक कृषि से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाने में उपयोगी साबित हो सकते हैं।
कृषि विशेषज्ञों की ओर से लगातार यह सलाह दी जाती रही है कि खेती में उत्पादन के साथ मिट्टी की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना जरूरी है। किसानों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि उर्वरकों का उपयोग फसल की जरूरत और मिट्टी की स्थिति के अनुरूप किया जाए। रायसी में आयोजित इस किसान सभा और कार्यशाला में भी इसी विषय को प्रमुखता से सामने रखा गया। कार्यक्रम में जैविक खाद, जैव उर्वरक और संतुलित रासायनिक उर्वरक इस्तेमाल के बीच समन्वय पर चर्चा हुई।
आयोजकों का उद्देश्य किसानों और विद्यार्थियों को कृषि एवं पर्यावरण से जुड़े विषयों के प्रति जागरूक करना रहा। ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक जानकारी को स्थानीय स्तर तक पहुंचाने और किसानों तथा शिक्षण संस्थानों के बीच संवाद को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
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