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पिथौरागढ़ जिले के पांगला क्षेत्र में पिछले कई दिनों से भालू का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। महिलाओं पर हमला, एक ग्रामीण की मौत और बच्चों में डर का माहौल—इन घटनाओं ने पूरे क्षेत्र को भय और असुरक्षा के साये में धकेल दिया है। ग्रामीणों ने जिला मुख्यालय पहुंचकर वन विभाग और प्रशासन से त्वरित कार्रवाई की मांग की है।
क्षेत्र में वन्यजीवों की बढ़ती गतिविधियाँ
पांगला, जयकोट और लंकारी क्षेत्र पहाड़ी भूगोल और घने जंगलों से घिरे हुए हैं। पिछले कुछ वर्षों में यहां मानव–वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की घटनाएँ सामने आई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि खेतों और घरों के आसपास भोजन की तलाश में भालू और अन्य जंगली जानवरों की आवाजाही लगातार बढ़ रही है, जिससे दैनिक जीवन पर भारी असर पड़ रहा है।
हाल के वर्षों में भालू हमलों की रिपोर्ट सामने आई हैं, जो इस समस्या के गंभीर होते स्वरूप को दर्शाती हैं।
14 नवंबर — दो महिलाओं पर हमला
प्रेस रिलीज़ के अनुसार, 14 नवंबर को जयकोट में घास काट रही नारु देवी और मीना देवी पर भालू ने हमला कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया।
21 नवंबर — नरेंद्र सिंह कार्की घायल
21 नवंबर को लंकारी के पास नरेंद्र सिंह कार्की पर भालू ने हमला कर दिया।
वह वर्तमान में हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल में उपचाराधीन हैं।
22 नवंबर — एक युवक की जान गई
22 नवंबर को पांगला निवासी नीरज सिंह बडाल भालू के हमले से बचने के प्रयास में अपनी जान से हाथ धो बैठे।
ग्रामीणों के मुताबिक यह घटना पूरे इलाके में भय और तनाव को और गहरा कर गई है।
युवा नेता भवान बिष्ट के नेतृत्व में ग्रामीणों का प्रतिनिधिमंडल 121 किमी दूर जिला मुख्यालय पहुंचा और केंद्रीय सड़क परिवहन राज्यमंत्री अजय टम्टा व डीएफओ को ज्ञापन सौंपा। भवान बिष्ट ने कहा:
“क्षेत्र में भालू की सक्रियता बढ़ गई है। महिलाएं खेतों में जाने से डर रही हैं और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। हमें तत्काल रैपिड रिस्पॉन्स टीम, गश्त और मुआवजा चाहिए।”
मुख्य मांगों में शामिल हैं—
- पांगला, जयकोट और लंकारी में रैपिड रिस्पॉन्स टीम की स्थापना
- वन विभाग की नियमित गश्त बढ़ाना
- घायलों को समुचित इलाज और मृतक परिवार को मुआवजा
- क्षेत्र में भालू गतिविधियों की निगरानी के लिए कैमरा/टीम तैनात करना
जनजीवन, शिक्षा और कृषि पर असर
भालू आतंक का सबसे ज्यादा असर महिलाओं, बच्चों और किसानों पर पड़ा है—
महिलाओं पर असर
- घास काटने, जंगल जाने और खेतों में काम करने में डर
- कई परिवारों ने महिलाओं का अकेले खेत में जाना बंद कर दिया है
बच्चों पर असर
- स्कूल जाने वाले बच्चे भयभीत
- जंगल या सुनसान रास्तों से गुजरने से हिचकिचाहट
- कई अभिभावकों ने बच्चों को भेजना कम कर दिया
किसानों की समस्या
- खेतों में फसल चौपट होने का खतरा
- रात में निगरानी करना मुश्किल
- पशुओं पर भी खतरा
ग्रामीणों के अनुसार, ऐसी घटनाओं ने “सामान्य जीवन को असामान्य तनाव” में बदल दिया है।
पिछले 5 वर्षों में पिथौरागढ़ और आसपास के क्षेत्रों में मानव–भालू संघर्ष की घटनाएँ बढ़ी हैं।
कई रिपोर्टों के अनुसार भालू हमले दर्ज किए गए, जिनमें गंभीर चोटें और संपत्ति की हानि भी शामिल है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि भोजन की कमी और मौसम बदलाव के चलते भालुओं की आबादी मानव बस्तियों की ओर खिसक सकती है।
पांगला क्षेत्र में भालू आतंक का बढ़ना गंभीर चिंता का विषय है। ग्रामीणों की सुरक्षा और दैनिक कामकाज पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
वन विभाग और प्रशासन को जल्द से जल्द—
- सक्रिय गश्त
- रैपिड रिस्पॉन्स टीम
- निगरानी व्यवस्था
- और जनजागरूकता अभियान
- शुरू करने की आवश्यकता है, ताकि मानव–वन्यजीव संघर्ष कम हो और ग्रामीणों में सुरक्षा की भावना लौट सके।
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